Wednesday, December 9, 2015
Sunday, December 6, 2015
दादा पड़-दादा कहानी सुनाते थे। जब GYAAN बट रहा था तब बहुजन के कुछ आलसी लोग हुक्का पीने की वजह से देर में पहुंचे तब तक GYAAN समाप्त हो गया और वो AGYANI ही रह गए । आज भी उसी तरह के बहुत सारे आलसी बहुजन है जो अपने Great महामानव परम पूजनीय बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर जी नहीं मानते। हिन्दू बाबाओं को मानते है इस वजह से आज भी गुलाम + AGYANI हैं।
Monday, November 2, 2015
स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह
आर. अनुराधा
(11.10.1967-14.06.2014)
महिला विषयों पर आर. अनुराधा के रचना संचयन से (यह लेख जनसत्ता, प्रभात खबर, चोखेर बाली ब्लॉग समेत दर्जनों जगहों पर छपा था)
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का
दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों
को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल
जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या
ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।
इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का
जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे
पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं।
उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी
जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे।
नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से
बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी
वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों
के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी
जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो
जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक
कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू
हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर,
खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए।
बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से
इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं।
धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम
को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर
सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को
बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की
अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता।
अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर
छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर
से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध
कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में
त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर
महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के
पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस
शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।
आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश
निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी
तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े
पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा
हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत
में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों
के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे
भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न
होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों
ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस
रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा
जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते
थे।
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।
कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि
किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक
ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म
हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत
बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।
इस
पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है।
विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर
दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य
सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े
न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी
बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में
आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी
हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए
महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर
विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा
बुनियादी हक छीन कर लिया।
— with Anuradha Mandal.
आर. अनुराधा
(11.10.1967-14.06.2014)
महिला विषयों पर आर. अनुराधा के रचना संचयन से (यह लेख जनसत्ता, प्रभात खबर, चोखेर बाली ब्लॉग समेत दर्जनों जगहों पर छपा था)
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।
इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।
आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।
कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया।
Sunday, October 18, 2015
👉👉👉 ** पूना पैक्ट ** 👇👇👇 2 October 2015 गांधी जयंती
कुछ लोगो को गांधी और बाबासाहब के बिच हुए ‘पूना पैक्ट’ के बारे में जानकारी नहीं है ,मै आप लोगो को संछेप में थोड़ी सी जानकारी देना चाहता हूँ ।
१) बाबासाहब चाहते थे की SC के लोगो को भारत में ”पृथक निर्वाचन छेत्र” मिले ,जहा से SC ही उमीदवार हो और उसे केवल SC ही वोट दे ।
२) बाबासाहब SC के लिए दो बार वोटिंग का अधिकार भी चाहते थे उदहारण के लिए ,अगर आप का विधानसभा SC रिज़र्व सीट है तो वहा SC को दो बार वोट देने का अधिकार मिलता ,एक बार वहा से खड़े होनेवाले SC नेता को सिर्फ SC जनता ही वोट दे सकती थी ,और दूसरी तरफ किसी भी जात का नेता खडा हो सकता था और SC जनता फिर से उसको वोट देने के अधिकारी होतेबाबासाहब की इन दोनों मांगो को अंग्रेजो ने मान लिया थापर इसके विरोध में गांधी ने उपवास शुरू कर डालाऔर उपवास के दौरान SC लोगो पर हमले होने लगे ,इस कारन बाबासाहब ने मजबूर होकर गांधी से समझौता किया और अपनी दोनों मांगे रद्द कर दी ,उसकी जगह पर ‘संयुक्त चुनाव प्रणाली “‘ लागू हो गयी ,जो आज भी चल रही है ,जहा SC के रिज़र्व सीट से, खडा तो SC होता है पर उसे वोट सभी लोगो का (सवर्णोंका, ओबीसी का ,मुस्लिमो का ) लेना पड़ता है ,और वो SC नेता SC को कम अन्य जातियों को ज्यादा खुश करने के चक्कर में अपने SC समाज का ही सत्यानाश कर डालता है सीधी भाषा में .. बाबासाहब चाहते थे घोड़े की दौड़ घोड़े से हो ,गधे की दौड़ गधे से हो ,हाथी की दौड़ हाथी से ही हो ,पर गांधी ने घोड़े की दौड़ गधे से लगाकर गधो के साथ अन्याय किया परिणाम ,सभी पार्टी से SC सीट से जीते SC विधायक ,खुद SC के ही विरोध के ही कामो का संसद और विधानसभा में खुलकर विरोध नहीं करते ,क्यों की उनको SC से ज्यादा बाकी लोगो को खुश करना होता है अगर SC को डबल वोटिंग और पृथक निर्वाचन छेत्र मिल जाता तो आगे चलकर ST OBC, मुसलमान ,सिख ,जैन ,बुद्धिस्ट ,एंग्लो इंडियन ,इत्यादि सब यही मांग करते और ब्राह्मणों से सब कट जाते और ब्राह्मणों के विरोध में काम करते ,जैसे आज ओबीसी रिजर्वेशन के मुद्दे पर ब्राह्मणों से कटते जा रहे है ,पर...
कुछ लोगो को गांधी और बाबासाहब के बिच हुए ‘पूना पैक्ट’ के बारे में जानकारी नहीं है ,मै आप लोगो को संछेप में थोड़ी सी जानकारी देना चाहता हूँ ।
१) बाबासाहब चाहते थे की SC के लोगो को भारत में ”पृथक निर्वाचन छेत्र” मिले ,जहा से SC ही उमीदवार हो और उसे केवल SC ही वोट दे ।
२) बाबासाहब SC के लिए दो बार वोटिंग का अधिकार भी चाहते थे उदहारण के लिए ,अगर आप का विधानसभा SC रिज़र्व सीट है तो वहा SC को दो बार वोट देने का अधिकार मिलता ,एक बार वहा से खड़े होनेवाले SC नेता को सिर्फ SC जनता ही वोट दे सकती थी ,और दूसरी तरफ किसी भी जात का नेता खडा हो सकता था और SC जनता फिर से उसको वोट देने के अधिकारी होतेबाबासाहब की इन दोनों मांगो को अंग्रेजो ने मान लिया थापर इसके विरोध में गांधी ने उपवास शुरू कर डालाऔर उपवास के दौरान SC लोगो पर हमले होने लगे ,इस कारन बाबासाहब ने मजबूर होकर गांधी से समझौता किया और अपनी दोनों मांगे रद्द कर दी ,उसकी जगह पर ‘संयुक्त चुनाव प्रणाली “‘ लागू हो गयी ,जो आज भी चल रही है ,जहा SC के रिज़र्व सीट से, खडा तो SC होता है पर उसे वोट सभी लोगो का (सवर्णोंका, ओबीसी का ,मुस्लिमो का ) लेना पड़ता है ,और वो SC नेता SC को कम अन्य जातियों को ज्यादा खुश करने के चक्कर में अपने SC समाज का ही सत्यानाश कर डालता है सीधी भाषा में .. बाबासाहब चाहते थे घोड़े की दौड़ घोड़े से हो ,गधे की दौड़ गधे से हो ,हाथी की दौड़ हाथी से ही हो ,पर गांधी ने घोड़े की दौड़ गधे से लगाकर गधो के साथ अन्याय किया परिणाम ,सभी पार्टी से SC सीट से जीते SC विधायक ,खुद SC के ही विरोध के ही कामो का संसद और विधानसभा में खुलकर विरोध नहीं करते ,क्यों की उनको SC से ज्यादा बाकी लोगो को खुश करना होता है अगर SC को डबल वोटिंग और पृथक निर्वाचन छेत्र मिल जाता तो आगे चलकर ST OBC, मुसलमान ,सिख ,जैन ,बुद्धिस्ट ,एंग्लो इंडियन ,इत्यादि सब यही मांग करते और ब्राह्मणों से सब कट जाते और ब्राह्मणों के विरोध में काम करते ,जैसे आज ओबीसी रिजर्वेशन के मुद्दे पर ब्राह्मणों से कटते जा रहे है ,पर...
बाबासाहब का यह सपना गांधी ने ख़तम कर डाला ।।
Monday, July 6, 2015
BY ......>>> Dbrambedkar Yvsamitifzd ---> -- अछूतों की ‘शिक्षा’ के लिए ‘बाबा साहब अम्बेडकर जी’ के अथक प्रयास ! ---
‘ब्रिटिंश’ राज में मैं ‘एक्जीक्यूटिव कौंसिलर’ था ! उस समय भारत के वायसाराय ‘लार्ड लिनलिथगो’ थे ! उनसे मैंने(Baba Saheb Ambedkar ji ne) एक दिन कहा कि, आप मुसलमानों के नाम पर, ‘अलीगढ़ विश्वविधालय’ को तीन लाख रुपये और हिंदुओं के नाम पर, ‘बनारस विश्व विधालय’ को तीन लाख रुपये देते हो, परंतु हम न तो ‘हिंदू’ हैं और न ही ‘मुसलमान’ ! अगर हमारे लिए भी आप कुछ करना चांहे तो, इससे भी कई गुना खर्च करना पड़ेगा ! अगर आप इतना न कर सकें तो, मुसलमानों के लिए जितना आप करते हैं उतना ही हमारे लिए भी करें ! इस संबध में ‘लिनलिथगो’ ने मुझ से कहा कि, मुझे जो कुछ भी कहना है , उसे एक पत्र में लिख कर दूँ ! उन के कथानुसार मैंने एक माँग पत्र उनको दे दिया !
एक बार मैं ‘लार्ड लिनलिथगों’ के पास फिर गया, और मैंने उनसे खुले दिल से ‘शिक्षा’ संबधी खर्चे पर बातें की । उनसे मैंने कहा कि, यदि आपको गुस्सा न आये तो एक प्रश्न पूँछना चांहता हूँ ।
उन्होंने कहा हाँ, ……. पूँछिए !
मैंने पूंछा कि, ….. “क्या यह सच नही है कि, ‘मैं’ अकेला ‘500 ग्रेज्ययेट्स’ के बराबर हूँ ?“
उन्होंने कहा, … ‘‘ हाँ मैं मानता हूँ !”
फिर मैंने उनसे पूंछा कि, …… “ इसका क्या कारण है ?”
इस पर उन्होंने कहा कि, …… “ उन्हैं मालूम नही है !”
तब मैंने उनसे कहा कि, ….. अपनी मेहनत से प्राप्त की गई मेरी ‘विद्धता’ इतनी है कि मैं इस विद्धता के बल पर ‘शासन’ के किसी भी ‘पद’ पर बैठ सकता हूँ ।
मुझे ऐसे ही विद्धान चाहिए, जिस प्रकार किले में निशाने पर बैठ कर ‘योद्धा सैनिक’, शत्रु को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार मेरी समझ के अनुरुप ऐसे ‘विद्धान’ व्यक्ति जो ‘शासन’ के पदों पर बैठ कर, मेरे ‘गरीब’ और ‘निरीह’ भाइयों की अच्छी तरह देख-रेख कर सकें । अगर आपको हमारे लोगों की भलाई ही करनी है तो, ऐसे ही लोगों को पैधा करना होगा । तभी इन ‘अछूतों’ की ‘भलाई’ हो सकेगी । केवल ‘क्लर्कों’ के ‘पद’ पर बैठ कर कुछ नही होने वाला ?
उन्होंने कहा हाँ, ……. पूँछिए !
मैंने पूंछा कि, ….. “क्या यह सच नही है कि, ‘मैं’ अकेला ‘500 ग्रेज्ययेट्स’ के बराबर हूँ ?“
उन्होंने कहा, … ‘‘ हाँ मैं मानता हूँ !”
फिर मैंने उनसे पूंछा कि, …… “ इसका क्या कारण है ?”
इस पर उन्होंने कहा कि, …… “ उन्हैं मालूम नही है !”
तब मैंने उनसे कहा कि, ….. अपनी मेहनत से प्राप्त की गई मेरी ‘विद्धता’ इतनी है कि मैं इस विद्धता के बल पर ‘शासन’ के किसी भी ‘पद’ पर बैठ सकता हूँ ।
मुझे ऐसे ही विद्धान चाहिए, जिस प्रकार किले में निशाने पर बैठ कर ‘योद्धा सैनिक’, शत्रु को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार मेरी समझ के अनुरुप ऐसे ‘विद्धान’ व्यक्ति जो ‘शासन’ के पदों पर बैठ कर, मेरे ‘गरीब’ और ‘निरीह’ भाइयों की अच्छी तरह देख-रेख कर सकें । अगर आपको हमारे लोगों की भलाई ही करनी है तो, ऐसे ही लोगों को पैधा करना होगा । तभी इन ‘अछूतों’ की ‘भलाई’ हो सकेगी । केवल ‘क्लर्कों’ के ‘पद’ पर बैठ कर कुछ नही होने वाला ?
मेरे इस कथन को ‘लार्ड लिनलिथगों’ ने ‘माना’ , और उसी बर्ष ‘26 विधार्थियों’ को ‘उच्च शिक्षा’ के लिए ‘विलायत’ भिजवा दिया //
Monday, June 15, 2015
Krushanadas Muchhadiya@ 4 hrs · **डॉ आंबेडकर की गांधी से टक्कर और जगजीवनराम की भूमिका*** @@ (युवा पीड़ी अवश्य और पूर्ण पड़े )@@ #########################
**डॉ आंबेडकर की गांधी से टक्कर और
जगजीवनराम की भूमिका***
@@ (युवा पीड़ी अवश्य और पूर्ण
पड़े )@@
#########################
बाबा साहेब ने अछूतों की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार
के सामने रखा था...
और उनके लिए कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान किये जाने
की मांग की....
किन्तु गांधी ने बाबा साहेब की मांग का
भरपूर विरोध कीया और इस वक्त
जगजीवन राम ने गांधी का पूर्ण साथ दिया ।
बाबा साहेब की तर्कसंगत बातें मानकर ब्रिटिश सरकार ने
विशेष सुविधाएँ देने के लिए बाबा साहेब डा. अम्बेडकर
जी का आग्रह मान लिया.....
और 1927 में साइमन कमीशन भारत आया,
मिस्टर गांधी को साइमन कमीशन का भारत
आना पसंद नहीं आया,
अतः उन्होंने जबर्दस्त नारे लगवाया, "साइमन कमीशन
गो बैक"
बाबा साहेब ने ब्रिटिश सरकार के सामने यह स्पष्ट किया कि....
अस्पृश्यों का हिन्दुओं से अलग अस्तित्व है....
वे गुलामों जैसा जीवन जी रहे है,
इनको न तो सार्वजानिक कुओं से पानी भरने
की इज़ाज़त है न ही पढ़ने लिखने का
अधिकार है,
हिन्दू धर्म में अछूतों के अधिकारों का अपहरण हुआ है....
और इनका कोई अपना अस्तित्व न रहे इसी लिए इन्हें
हिन्दू धर्म का अंग घोषित करते रहते है....
सन 1930, 1931, 1932, में लन्दन की गोलमेज
कॉन्फ्रेंस में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर जी ने अछूत
कहे जाने वाले समाज की वकालत की....
उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भी नहीं बख्सा
और कहा कि.....
क्या अंग्रेज साम्राज्यशाही ने छुआ-छूत को ख़त्म
करने के लिए कोई कदम उठाया....
ब्रिटिश राज्य के डेढ़ सौ वर्षों में अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई
कमी नहीं आई....
बाबा साहेब ने गोलमेज कॉन्फ्रेंस में जो तर्क रखे वो इतने ठोस और
अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार को बाबा साहेब के सामने झुकना
पड़ा....
1932 में रामसे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए
एक तत्कालीन योजना की घोषणा
की....
इसे कम्युनल एवार्ड के नाम से जाना गया....
इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दुहरा अधिकार
मिला....प्रथम वे सुनिश्चित सीटों की
आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे.....
और दूसरा दो वोटों का अधिकार मिला,
एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट
अनारक्षित सीट के लिए...........(कम्युनल अवार्ड -
सिक्ख/ मुस्लिम// ईसाई /एंग्लोइंडियन समुदाय को पूर्व से मिला
था )
यह अधिकार दिलाने से बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का कद समाज में
काफी ऊँचा हो गया,
डा. अम्बेडकर जी ने इस अधिकार के सम्बन्ध में
कहा....
पृथक निर्वाचन के अधिकार की मांग से हम हिन्दू धर्म
का कोई अहित नहीं करने वाले है,
हम तो केवल उन सवर्ण हिन्दुओं के ऊपर अपने भाग्य निर्माण
की निर्भरता से मुक्ति चाहते है....
मिस्टर गांधी कम्युनल एवार्ड के विरोध में थे....
वे नहीं चाहते थे कि अछूत समाज हिन्दुओं से अलग
हो....
वे अछूत समाज को हिन्दुओं का एक अभिन्न अंग मानते थे...
लेकिन जब बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने गांधी से
प्रश्न किया कि....
अगर अछूत हिन्दुओं का अभिन्न अंग है तो फिर उनके साथ
जानवरों जैसा सलूक क्यों..?
लेकिन इस प्रश्न का जवाब मिस्टर गांधी बाबा साहेब को
कभी नहीं दे पाएं....
बाबा साहेब ने मिस्टर गांधी से कहा कि....
मिस्टर मोहन दास करम चन्द गांधी....
आप अछूतों की एक बहुत अच्छी नर्स
हो सकते है....
परन्तु मैं उनकी माँ हूँ.........
और माँ अपने बच्चों का अहित कभी नहीं
होने देती है....
मिस्टर गांधी ने कम्युनल एवार्ड के खिलाफ आमरण
अनशन कर दिया....
उस समय वह यरवदा जेल में थे और यही वह
अधिकार था जिस से देश के करोड़ों अछूतों को एक नया
जीवन मिलता और वे सदियों से चली आ
रही गुलामी से मुक्त हो जाते.....
लेकिन मिस्टर गांधी के आमरण अनशन के कारण बाबा
साहेब की उमीदों पर पानी
फिरता नज़र आने लगा,
मिस्टर गांधी अपनी जिद्द पर अडिग थे तो
बाबा साहेब किसी भी कीमत
पर इस अधिकार को खोना नहीं चाहते थे....
आमरण अनशन के कारण गांधी जी मौत
के करीब पहुँच गए इस बीच बाबा साहेब
को धमकियों भरे बहुत से पत्र मिलने लगे....
जिसमे लिखा था कि वो इस अधिकार को छोड़ दें अन्यथा
ठीक नहीं होगा....
बाबा साहेब को ऐसे पत्र जरा सा भी विचलित
नहीं कर सके....
उन्हें अपने मरने का डर बिलकुल नहीं था....
मिस्टर गांधी की हालत दिन पर दिन
बिगड़ती जा रही थी....
इसी बीच बाबा साहेब को और खत प्राप्त
हुए कि अगर गांधी जी को कुछ हुआ तो
हम अछूतों की बस्तियों को उजाड़ देंगे....
बाबा साहेब ने सोचा जब अछूत ही नहीं
रहेंगे तो फिर मैं किसके लिए लड़ूंगा,
बाबा साहेब के जो मित्र थे उन्होंने भी बाबा साहेब को
समझाया कि...
अगर एक गांधी मर गया तो दूसरा गांधी पैदा
हो जायेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे तो फिर आप के
समाज का क्या होगा....
बाबा साहेब ने काफी गंभीरता से विचार करने
के बाद पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने का मन बना लिया....
और 24 सितम्बर 1932 को आँखों में आंसू लिए हुए बाबा साहेब ने
पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किये इस संदर्भ में बाबा साहेब का नाम
अमर रहेगा क्योंकि उन्होंने मिस्टर गांधी को
जीवन दान दे दिया....
तीसरे दिन डा. अम्बेडकर ने पूना पैक्ट का धिक्कार
दिवस आयोजित किया....
मंच से रोते हुए डा. अम्बेडकर जी ने कहा कि "पूना
पैक्ट पर हस्ताक्षर करके मैंने अपने जीवन
की सबसे बड़ी गलती
की है....
मैं ऐसा करने को विवश था....
मेरे बच्चों....
मेरी इस भूल को सुधार लेना...
बाबा साहेब ने अपने जीवन में कभी मिस्टर
गांधी को महात्मा नहीं माना वे ज्योतिबा फुले
जी को सच्चा महात्मा मानते है.... और
जगजीवन राम को गद्दार .....
*** मित्रो यह है पूना पेक्ट का असली सच ***
जय भीम **** जय प्रबुद्ध भारत ***
जगजीवनराम की भूमिका***
@@ (युवा पीड़ी अवश्य और पूर्ण
पड़े )@@
#########################
बाबा साहेब ने अछूतों की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार
के सामने रखा था...
और उनके लिए कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान किये जाने
की मांग की....
किन्तु गांधी ने बाबा साहेब की मांग का
भरपूर विरोध कीया और इस वक्त
जगजीवन राम ने गांधी का पूर्ण साथ दिया ।
बाबा साहेब की तर्कसंगत बातें मानकर ब्रिटिश सरकार ने
विशेष सुविधाएँ देने के लिए बाबा साहेब डा. अम्बेडकर
जी का आग्रह मान लिया.....
और 1927 में साइमन कमीशन भारत आया,
मिस्टर गांधी को साइमन कमीशन का भारत
आना पसंद नहीं आया,
अतः उन्होंने जबर्दस्त नारे लगवाया, "साइमन कमीशन
गो बैक"
बाबा साहेब ने ब्रिटिश सरकार के सामने यह स्पष्ट किया कि....
अस्पृश्यों का हिन्दुओं से अलग अस्तित्व है....
वे गुलामों जैसा जीवन जी रहे है,
इनको न तो सार्वजानिक कुओं से पानी भरने
की इज़ाज़त है न ही पढ़ने लिखने का
अधिकार है,
हिन्दू धर्म में अछूतों के अधिकारों का अपहरण हुआ है....
और इनका कोई अपना अस्तित्व न रहे इसी लिए इन्हें
हिन्दू धर्म का अंग घोषित करते रहते है....
सन 1930, 1931, 1932, में लन्दन की गोलमेज
कॉन्फ्रेंस में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर जी ने अछूत
कहे जाने वाले समाज की वकालत की....
उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भी नहीं बख्सा
और कहा कि.....
क्या अंग्रेज साम्राज्यशाही ने छुआ-छूत को ख़त्म
करने के लिए कोई कदम उठाया....
ब्रिटिश राज्य के डेढ़ सौ वर्षों में अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई
कमी नहीं आई....
बाबा साहेब ने गोलमेज कॉन्फ्रेंस में जो तर्क रखे वो इतने ठोस और
अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार को बाबा साहेब के सामने झुकना
पड़ा....
1932 में रामसे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए
एक तत्कालीन योजना की घोषणा
की....
इसे कम्युनल एवार्ड के नाम से जाना गया....
इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दुहरा अधिकार
मिला....प्रथम वे सुनिश्चित सीटों की
आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे.....
और दूसरा दो वोटों का अधिकार मिला,
एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट
अनारक्षित सीट के लिए...........(कम्युनल अवार्ड -
सिक्ख/ मुस्लिम// ईसाई /एंग्लोइंडियन समुदाय को पूर्व से मिला
था )
यह अधिकार दिलाने से बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का कद समाज में
काफी ऊँचा हो गया,
डा. अम्बेडकर जी ने इस अधिकार के सम्बन्ध में
कहा....
पृथक निर्वाचन के अधिकार की मांग से हम हिन्दू धर्म
का कोई अहित नहीं करने वाले है,
हम तो केवल उन सवर्ण हिन्दुओं के ऊपर अपने भाग्य निर्माण
की निर्भरता से मुक्ति चाहते है....
मिस्टर गांधी कम्युनल एवार्ड के विरोध में थे....
वे नहीं चाहते थे कि अछूत समाज हिन्दुओं से अलग
हो....
वे अछूत समाज को हिन्दुओं का एक अभिन्न अंग मानते थे...
लेकिन जब बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने गांधी से
प्रश्न किया कि....
अगर अछूत हिन्दुओं का अभिन्न अंग है तो फिर उनके साथ
जानवरों जैसा सलूक क्यों..?
लेकिन इस प्रश्न का जवाब मिस्टर गांधी बाबा साहेब को
कभी नहीं दे पाएं....
बाबा साहेब ने मिस्टर गांधी से कहा कि....
मिस्टर मोहन दास करम चन्द गांधी....
आप अछूतों की एक बहुत अच्छी नर्स
हो सकते है....
परन्तु मैं उनकी माँ हूँ.........
और माँ अपने बच्चों का अहित कभी नहीं
होने देती है....
मिस्टर गांधी ने कम्युनल एवार्ड के खिलाफ आमरण
अनशन कर दिया....
उस समय वह यरवदा जेल में थे और यही वह
अधिकार था जिस से देश के करोड़ों अछूतों को एक नया
जीवन मिलता और वे सदियों से चली आ
रही गुलामी से मुक्त हो जाते.....
लेकिन मिस्टर गांधी के आमरण अनशन के कारण बाबा
साहेब की उमीदों पर पानी
फिरता नज़र आने लगा,
मिस्टर गांधी अपनी जिद्द पर अडिग थे तो
बाबा साहेब किसी भी कीमत
पर इस अधिकार को खोना नहीं चाहते थे....
आमरण अनशन के कारण गांधी जी मौत
के करीब पहुँच गए इस बीच बाबा साहेब
को धमकियों भरे बहुत से पत्र मिलने लगे....
जिसमे लिखा था कि वो इस अधिकार को छोड़ दें अन्यथा
ठीक नहीं होगा....
बाबा साहेब को ऐसे पत्र जरा सा भी विचलित
नहीं कर सके....
उन्हें अपने मरने का डर बिलकुल नहीं था....
मिस्टर गांधी की हालत दिन पर दिन
बिगड़ती जा रही थी....
इसी बीच बाबा साहेब को और खत प्राप्त
हुए कि अगर गांधी जी को कुछ हुआ तो
हम अछूतों की बस्तियों को उजाड़ देंगे....
बाबा साहेब ने सोचा जब अछूत ही नहीं
रहेंगे तो फिर मैं किसके लिए लड़ूंगा,
बाबा साहेब के जो मित्र थे उन्होंने भी बाबा साहेब को
समझाया कि...
अगर एक गांधी मर गया तो दूसरा गांधी पैदा
हो जायेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे तो फिर आप के
समाज का क्या होगा....
बाबा साहेब ने काफी गंभीरता से विचार करने
के बाद पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने का मन बना लिया....
और 24 सितम्बर 1932 को आँखों में आंसू लिए हुए बाबा साहेब ने
पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किये इस संदर्भ में बाबा साहेब का नाम
अमर रहेगा क्योंकि उन्होंने मिस्टर गांधी को
जीवन दान दे दिया....
तीसरे दिन डा. अम्बेडकर ने पूना पैक्ट का धिक्कार
दिवस आयोजित किया....
मंच से रोते हुए डा. अम्बेडकर जी ने कहा कि "पूना
पैक्ट पर हस्ताक्षर करके मैंने अपने जीवन
की सबसे बड़ी गलती
की है....
मैं ऐसा करने को विवश था....
मेरे बच्चों....
मेरी इस भूल को सुधार लेना...
बाबा साहेब ने अपने जीवन में कभी मिस्टर
गांधी को महात्मा नहीं माना वे ज्योतिबा फुले
जी को सच्चा महात्मा मानते है.... और
जगजीवन राम को गद्दार .....
*** मित्रो यह है पूना पेक्ट का असली सच ***
जय भीम **** जय प्रबुद्ध भारत ***
Thursday, June 11, 2015
आज १८ मार्च, आज के दिन बाबा साहब डॉ. आम्बेडकरने वह प्रसिद्ध ऐतिहासीस भाषण आग्रा के रामलीला मैदानसे किया था ।क्या कहा था बाबा साहबने……………
“इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है”
= बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर,
समाज के जिम्मेदार लोगों से बाबा साहब की एक अपील !!!
बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण !!
आगरा, 18 मार्च 1956
जन समूह से -
पिछले तीस वर्षों से तुम लोगों को राजनैतिक अधिकार के लिये मै संघर्ष कर रहा हूँ। मैने तुम्हें संसद और राज्यों की विधान सभाओं में सीटों का आरक्षण दिलवाया। मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिये उचित प्रावधान करवाये। आज, हम प्रगित कर सकते है। अब यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि शैक्षणिक,आथिर्क और सामाजिक गैर बराबरी को दूर करने हेतु एक जुट होकर इस संघर्ष को जारी रखें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिये तैयार रहना होगा,यहाँ तक कि खून बहाने के लिये भी।
नेताओ से-
यदि कोई तुम्हें अपने महल में बुलाता है तो स्वेच्छा से जाओ। लेकिन अपनी झौपड़ी में आग लगाकर नहीं। यदि वह राजा किसी दिन आपसे झगड़ता है और आपको अपने महल से बाहर धकेल देता है, उस समय तुम कहां जाओगे? यदि तुम अपने आपको बेचना चाहते हो तो बेचो, लेकिन किसी भी हालत में अपने संगठन को बर्वाद होने की कीमत पर नहीं। मुझे दूसरों से कोई खतरा नहीं है, लेकिन मै अपने लोगों से ही खतरा महसूस कर रहा हूँ।
भूमिहीन मजदूरों से -
मै गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिये काफी चिंतित हूँ। मै उनके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ। मै उनकी दुख तकलीफों को नजरन्दाज नहीं कर पा रहा हूँ। उनकी तबाहियों का मुख्य कारण उनका भूमिहीन होना है। इसलिए वे अत्याचार और अपमान के शिकार होते रहते हैं और वे अपना उत्थान नहीं कर पाते। मै इसके लिये संघर्ष करूंगा। यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पन्न करती है तो मै इन लोगों का नेतृत्व करूंगा और इनकी वैधानिक लड़ाई लडूँगा। लेकिन किसी भी हालात में भूमिहीन लोगों को जमीन दिलवाले का प्रयास करूंगा।
अपने समर्थकों से-
बहुत जल्दी ही मै तथागत बुद्ध के धर्म को अंगीकार कर लूंगा। यह प्रगतिवादी धर्म है। यह समानता, स्वतंत्रता एवं वंधुत्व पर आधारित है। मै इस धर्म को बहुत सालों के प्रयासों के बाद खोज पाया हूँ। अब मै जल्दी ही बुद्धिस्ट बन जाऊंगा। तब एक अछूत के रूप में मै आपके बीच नहीं रह पाऊँगा,लेकिन एक सच्चे बुद्धिस्ट के रूप में तुम लोगों के कल्याण के लिये संघर्ष जारी रखूंगा। मै तुम्हें अपने साथ बुद्धिस्ट बनने के लिये नहीं कहूंगा, क्योंकि मै आपको अंधभक्त नहीं बनाना चाहता परुन्त जिन्हें इस महान धर्म की शरण में आने की तमत्रा है वे बौद्ध धर्म अंगीकार कर सकते है, जिससे वे इस धर्म में द्रण विशवास के साथ रहें और बौद्धाचरण का अनुसरण करें।
बौद्ध भिक्षुओं से-
बौद्ध धम्म महान धर्म है। इस धर्म संस्थापक तथागत बुद्ध ने इस धर्म का प्रसार किया और अपनी अच्छाईयों के कारण यह धर्म भारत में दूर-दूर तक गली-कूचों में पहुंच सका। लेकिन महान उत्कर्ष पर पहुंचने के बाद यह धर्म 1213 ई. में भारत से विलुप्त हो गया जिसके कई कारण हो सकते हैं। एक प्रमुख कारण यह भी है की बौद्ध भिक्षु विलासतापूर्ण एवं आरामतलब जिदंगी जीने के आदी हो गय थे। धर्म प्रचार हेतु स्थान-स्थान पर जाने की बजाय उन्होंने विहारों में आराम करना शुरू कर दिया तथा रजबाड़ो की प्रशंसा में पुस्तकें लिखना शुरू कर दिया। अब इस धर्म की पुनरस्थापना हेतु उन्हें कड़ी मेहनत करनी पडेगी। उन्हें दरवाजे-दरवाजे जाना पडेगा। मुझे समाज में एसे बहुत कम भिक्षु दिखाई देते हैं,इसलिये जन साधारण में से अच्छे लोगों को भी इस धर्म प्रसार हेतु आगे आना चाहिये और इनके संस्कारों को ग्रहण करना चाहिये।
शासकीय कर्मचारियों से -
हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये हैं परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे,किन्तु मै देख रहा हूँ कि छोटे और बडे क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपनी तौदें (पेट) भरने में व्यस्त हैं। मेरा आग्रह है कि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं,उनका कर्तव्य है कि वे अपने वेतन का 20वां भाग (5%)स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु दें। तभी समग्र समाज प्रगति कर सकेगा अन्यथा केवल चन्द लोगों का ही सुधार होता रहेगा। कोई बालक जब गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो संपूर्ण समाज की आशायें उस पर टिक जाती हैं। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता समाज के लिये वरदान साबित हो सकता है।
छात्रों एवं युवाओं से-
मेरी छात्रों से अपील है की शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी प्रकार कि क्लर्की करने के बजाय उसे अपने गांव की अथवा आस-पास के लोगों की सेवा करना चाहिये। जिससे अज्ञानता से उत्पत्र शोषण एवं अन्याय को रोका जा सके। आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है।
"आज मेरी स्थिति एक बड़े खंभे की तरह है, जो विशाल टेंटों को संभाल रही है। मै उस समय के लिये चिंतित हूँ कि जब यह खंभा अपनी जगह पर नहीं रहेगा। मेरा स्वास्थ ठीक नहीं रहता है। मै नहीं जानता, कि मै कब आप लोगों के बीच से चला जाऊँ। मै किसी एक ऐसे नवयुवक को नहीं ढूंढ पा रहा हूँ, जो इन करोड़ों असहाय और निराश लोगों के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी ले सके। यदि कोई नौजवान इस जिम्मेदारी को लेने के लिये आगे आता है, तो मै चैन से मर सकूंगा।"
(संदर्भ- सलेक्टेड स्पीच आफँ डाँ अम्बेडकर - लेखक डी.सी. अहीर पृष्ठ क्रमांक 110 से 11 तक के भाषण का हिन्दी अनुवाद)
बुद्धिजीवी साथियों से विनम्र निवेदन है कि इस ऐतिहासिक भाषण की प्रतियाँ छपवाकर समाज में वितरित करें, यह एक सामाजिक जागृति का महान दयित्व है।
(समाज हित में जारी)
(आर.पी.एस.हरित. बामसेफ )
— with Ge“इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है”
= बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर,
समाज के जिम्मेदार लोगों से बाबा साहब की एक अपील !!!
बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण !!
आगरा, 18 मार्च 1956
जन समूह से -
पिछले तीस वर्षों से तुम लोगों को राजनैतिक अधिकार के लिये मै संघर्ष कर रहा हूँ। मैने तुम्हें संसद और राज्यों की विधान सभाओं में सीटों का आरक्षण दिलवाया। मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिये उचित प्रावधान करवाये। आज, हम प्रगित कर सकते है। अब यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि शैक्षणिक,आथिर्क और सामाजिक गैर बराबरी को दूर करने हेतु एक जुट होकर इस संघर्ष को जारी रखें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिये तैयार रहना होगा,यहाँ तक कि खून बहाने के लिये भी।
नेताओ से-
यदि कोई तुम्हें अपने महल में बुलाता है तो स्वेच्छा से जाओ। लेकिन अपनी झौपड़ी में आग लगाकर नहीं। यदि वह राजा किसी दिन आपसे झगड़ता है और आपको अपने महल से बाहर धकेल देता है, उस समय तुम कहां जाओगे? यदि तुम अपने आपको बेचना चाहते हो तो बेचो, लेकिन किसी भी हालत में अपने संगठन को बर्वाद होने की कीमत पर नहीं। मुझे दूसरों से कोई खतरा नहीं है, लेकिन मै अपने लोगों से ही खतरा महसूस कर रहा हूँ।
भूमिहीन मजदूरों से -
मै गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिये काफी चिंतित हूँ। मै उनके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ। मै उनकी दुख तकलीफों को नजरन्दाज नहीं कर पा रहा हूँ। उनकी तबाहियों का मुख्य कारण उनका भूमिहीन होना है। इसलिए वे अत्याचार और अपमान के शिकार होते रहते हैं और वे अपना उत्थान नहीं कर पाते। मै इसके लिये संघर्ष करूंगा। यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पन्न करती है तो मै इन लोगों का नेतृत्व करूंगा और इनकी वैधानिक लड़ाई लडूँगा। लेकिन किसी भी हालात में भूमिहीन लोगों को जमीन दिलवाले का प्रयास करूंगा।
अपने समर्थकों से-
बहुत जल्दी ही मै तथागत बुद्ध के धर्म को अंगीकार कर लूंगा। यह प्रगतिवादी धर्म है। यह समानता, स्वतंत्रता एवं वंधुत्व पर आधारित है। मै इस धर्म को बहुत सालों के प्रयासों के बाद खोज पाया हूँ। अब मै जल्दी ही बुद्धिस्ट बन जाऊंगा। तब एक अछूत के रूप में मै आपके बीच नहीं रह पाऊँगा,लेकिन एक सच्चे बुद्धिस्ट के रूप में तुम लोगों के कल्याण के लिये संघर्ष जारी रखूंगा। मै तुम्हें अपने साथ बुद्धिस्ट बनने के लिये नहीं कहूंगा, क्योंकि मै आपको अंधभक्त नहीं बनाना चाहता परुन्त जिन्हें इस महान धर्म की शरण में आने की तमत्रा है वे बौद्ध धर्म अंगीकार कर सकते है, जिससे वे इस धर्म में द्रण विशवास के साथ रहें और बौद्धाचरण का अनुसरण करें।
बौद्ध भिक्षुओं से-
बौद्ध धम्म महान धर्म है। इस धर्म संस्थापक तथागत बुद्ध ने इस धर्म का प्रसार किया और अपनी अच्छाईयों के कारण यह धर्म भारत में दूर-दूर तक गली-कूचों में पहुंच सका। लेकिन महान उत्कर्ष पर पहुंचने के बाद यह धर्म 1213 ई. में भारत से विलुप्त हो गया जिसके कई कारण हो सकते हैं। एक प्रमुख कारण यह भी है की बौद्ध भिक्षु विलासतापूर्ण एवं आरामतलब जिदंगी जीने के आदी हो गय थे। धर्म प्रचार हेतु स्थान-स्थान पर जाने की बजाय उन्होंने विहारों में आराम करना शुरू कर दिया तथा रजबाड़ो की प्रशंसा में पुस्तकें लिखना शुरू कर दिया। अब इस धर्म की पुनरस्थापना हेतु उन्हें कड़ी मेहनत करनी पडेगी। उन्हें दरवाजे-दरवाजे जाना पडेगा। मुझे समाज में एसे बहुत कम भिक्षु दिखाई देते हैं,इसलिये जन साधारण में से अच्छे लोगों को भी इस धर्म प्रसार हेतु आगे आना चाहिये और इनके संस्कारों को ग्रहण करना चाहिये।
शासकीय कर्मचारियों से -
हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये हैं परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे,किन्तु मै देख रहा हूँ कि छोटे और बडे क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपनी तौदें (पेट) भरने में व्यस्त हैं। मेरा आग्रह है कि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं,उनका कर्तव्य है कि वे अपने वेतन का 20वां भाग (5%)स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु दें। तभी समग्र समाज प्रगति कर सकेगा अन्यथा केवल चन्द लोगों का ही सुधार होता रहेगा। कोई बालक जब गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो संपूर्ण समाज की आशायें उस पर टिक जाती हैं। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता समाज के लिये वरदान साबित हो सकता है।
छात्रों एवं युवाओं से-
मेरी छात्रों से अपील है की शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी प्रकार कि क्लर्की करने के बजाय उसे अपने गांव की अथवा आस-पास के लोगों की सेवा करना चाहिये। जिससे अज्ञानता से उत्पत्र शोषण एवं अन्याय को रोका जा सके। आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है।
"आज मेरी स्थिति एक बड़े खंभे की तरह है, जो विशाल टेंटों को संभाल रही है। मै उस समय के लिये चिंतित हूँ कि जब यह खंभा अपनी जगह पर नहीं रहेगा। मेरा स्वास्थ ठीक नहीं रहता है। मै नहीं जानता, कि मै कब आप लोगों के बीच से चला जाऊँ। मै किसी एक ऐसे नवयुवक को नहीं ढूंढ पा रहा हूँ, जो इन करोड़ों असहाय और निराश लोगों के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी ले सके। यदि कोई नौजवान इस जिम्मेदारी को लेने के लिये आगे आता है, तो मै चैन से मर सकूंगा।"
(संदर्भ- सलेक्टेड स्पीच आफँ डाँ अम्बेडकर - लेखक डी.सी. अहीर पृष्ठ क्रमांक 110 से 11 तक के भाषण का हिन्दी अनुवाद)
बुद्धिजीवी साथियों से विनम्र निवेदन है कि इस ऐतिहासिक भाषण की प्रतियाँ छपवाकर समाज में वितरित करें, यह एक सामाजिक जागृति का महान दयित्व है।
(समाज हित में जारी)
(आर.पी.एस.हरित. बामसेफ )
Thursday, May 28, 2015
साभार : रवि पी. गौतम मूलनिवासी
बेजुबान पत्थर पे लदे है करोडो के गहने मंदिरो में ।उसी देहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथो को देखा है।।सजे थे छप्पन भोग और मेवे मूरत के आगे । बाहर एक फ़कीर को भूख से तड़प के मरते देखा है ।।लदी हुई है रेशमी चादरों से वो हरी मजार ,पर बहार
एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है।
वो दे आया एक लाख गुरद्वारे में हाल के लिए ,
घर में उसको 500 रूपये के लिए काम वाली बाई बदलते देखा है।
सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई दुनिया का दर्द
मिटाने को ।
आज चर्च में बेटे की मार से बिलखते माँ बाप को देखा है।
जलाती रही जो अखन्ड ज्योति देसी घी की दिन रात पुजारन ,
आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण मौत से लड़ते देखा है ।
जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी ,
आज लगाते उसको भंडारे मरने के बाद देखा ।
दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था जिस बेटी को जबरन बाप ने,
आज पीटते उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है ।
मारा गया वो पंडित बेमौत सड़क दुर्घटना में यारो ,
जिसे खुदको काल सर्प,तारे और हाथ की लकीरो का माहिर लिखते देखा है ।
जिस घर की एकता की देता था जमाना कभी मिसाल दोस्तों ,
आज उसी आँगन में खिंचती दीवार को देखा है।.........
Subscribe to:
Comments (Atom)
