Monday, June 15, 2015

Krushanadas Muchhadiya@ 4 hrs · **डॉ आंबेडकर की गांधी से टक्कर और जगजीवनराम की भूमिका*** @@ (युवा पीड़ी अवश्य और पूर्ण पड़े )@@ #########################


**डॉ आंबेडकर की गांधी से टक्कर और
जगजीवनराम की भूमिका***
@@ (युवा पीड़ी अवश्य और पूर्ण
पड़े )@@
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बाबा साहेब ने अछूतों की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार
के सामने रखा था...
और उनके लिए कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान किये जाने
की मांग की....
किन्तु गांधी ने बाबा साहेब की मांग का
भरपूर विरोध कीया और इस वक्त
जगजीवन राम ने गांधी का पूर्ण साथ दिया ।
बाबा साहेब की तर्कसंगत बातें मानकर ब्रिटिश सरकार ने
विशेष सुविधाएँ देने के लिए बाबा साहेब डा. अम्बेडकर
जी का आग्रह मान लिया.....
और 1927 में साइमन कमीशन भारत आया,
मिस्टर गांधी को साइमन कमीशन का भारत
आना पसंद नहीं आया,
अतः उन्होंने जबर्दस्त नारे लगवाया, "साइमन कमीशन
गो बैक"
बाबा साहेब ने ब्रिटिश सरकार के सामने यह स्पष्ट किया कि....
अस्पृश्यों का हिन्दुओं से अलग अस्तित्व है....
वे गुलामों जैसा जीवन जी रहे है,
इनको न तो सार्वजानिक कुओं से पानी भरने
की इज़ाज़त है न ही पढ़ने लिखने का
अधिकार है,
हिन्दू धर्म में अछूतों के अधिकारों का अपहरण हुआ है....
और इनका कोई अपना अस्तित्व न रहे इसी लिए इन्हें
हिन्दू धर्म का अंग घोषित करते रहते है....
सन 1930, 1931, 1932, में लन्दन की गोलमेज
कॉन्फ्रेंस में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर जी ने अछूत
कहे जाने वाले समाज की वकालत की....
उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भी नहीं बख्सा
और कहा कि.....
क्या अंग्रेज साम्राज्यशाही ने छुआ-छूत को ख़त्म
करने के लिए कोई कदम उठाया....
ब्रिटिश राज्य के डेढ़ सौ वर्षों में अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई
कमी नहीं आई....
बाबा साहेब ने गोलमेज कॉन्फ्रेंस में जो तर्क रखे वो इतने ठोस और
अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार को बाबा साहेब के सामने झुकना
पड़ा....
1932 में रामसे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए
एक तत्कालीन योजना की घोषणा
की....
इसे कम्युनल एवार्ड के नाम से जाना गया....
इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दुहरा अधिकार
मिला....प्रथम वे सुनिश्चित सीटों की
आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे.....
और दूसरा दो वोटों का अधिकार मिला,
एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट
अनारक्षित सीट के लिए...........(कम्युनल अवार्ड -
सिक्ख/ मुस्लिम// ईसाई /एंग्लोइंडियन समुदाय को पूर्व से मिला
था )
यह अधिकार दिलाने से बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का कद समाज में
काफी ऊँचा हो गया,
डा. अम्बेडकर जी ने इस अधिकार के सम्बन्ध में
कहा....
पृथक निर्वाचन के अधिकार की मांग से हम हिन्दू धर्म
का कोई अहित नहीं करने वाले है,
हम तो केवल उन सवर्ण हिन्दुओं के ऊपर अपने भाग्य निर्माण
की निर्भरता से मुक्ति चाहते है....
मिस्टर गांधी कम्युनल एवार्ड के विरोध में थे....
वे नहीं चाहते थे कि अछूत समाज हिन्दुओं से अलग
हो....
वे अछूत समाज को हिन्दुओं का एक अभिन्न अंग मानते थे...
लेकिन जब बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने गांधी से
प्रश्न किया कि....
अगर अछूत हिन्दुओं का अभिन्न अंग है तो फिर उनके साथ
जानवरों जैसा सलूक क्यों..?
लेकिन इस प्रश्न का जवाब मिस्टर गांधी बाबा साहेब को
कभी नहीं दे पाएं....
बाबा साहेब ने मिस्टर गांधी से कहा कि....
मिस्टर मोहन दास करम चन्द गांधी....
आप अछूतों की एक बहुत अच्छी नर्स
हो सकते है....
परन्तु मैं उनकी माँ हूँ.........
और माँ अपने बच्चों का अहित कभी नहीं
होने देती है....
मिस्टर गांधी ने कम्युनल एवार्ड के खिलाफ आमरण
अनशन कर दिया....
उस समय वह यरवदा जेल में थे और यही वह
अधिकार था जिस से देश के करोड़ों अछूतों को एक नया
जीवन मिलता और वे सदियों से चली आ
रही गुलामी से मुक्त हो जाते.....
लेकिन मिस्टर गांधी के आमरण अनशन के कारण बाबा
साहेब की उमीदों पर पानी
फिरता नज़र आने लगा,
मिस्टर गांधी अपनी जिद्द पर अडिग थे तो
बाबा साहेब किसी भी कीमत
पर इस अधिकार को खोना नहीं चाहते थे....
आमरण अनशन के कारण गांधी जी मौत
के करीब पहुँच गए इस बीच बाबा साहेब
को धमकियों भरे बहुत से पत्र मिलने लगे....
जिसमे लिखा था कि वो इस अधिकार को छोड़ दें अन्यथा
ठीक नहीं होगा....
बाबा साहेब को ऐसे पत्र जरा सा भी विचलित
नहीं कर सके....
उन्हें अपने मरने का डर बिलकुल नहीं था....
मिस्टर गांधी की हालत दिन पर दिन
बिगड़ती जा रही थी....
इसी बीच बाबा साहेब को और खत प्राप्त
हुए कि अगर गांधी जी को कुछ हुआ तो
हम अछूतों की बस्तियों को उजाड़ देंगे....
बाबा साहेब ने सोचा जब अछूत ही नहीं
रहेंगे तो फिर मैं किसके लिए लड़ूंगा,
बाबा साहेब के जो मित्र थे उन्होंने भी बाबा साहेब को
समझाया कि...
अगर एक गांधी मर गया तो दूसरा गांधी पैदा
हो जायेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे तो फिर आप के
समाज का क्या होगा....
बाबा साहेब ने काफी गंभीरता से विचार करने
के बाद पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने का मन बना लिया....
और 24 सितम्बर 1932 को आँखों में आंसू लिए हुए बाबा साहेब ने
पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किये इस संदर्भ में बाबा साहेब का नाम
अमर रहेगा क्योंकि उन्होंने मिस्टर गांधी को
जीवन दान दे दिया....
तीसरे दिन डा. अम्बेडकर ने पूना पैक्ट का धिक्कार
दिवस आयोजित किया....
मंच से रोते हुए डा. अम्बेडकर जी ने कहा कि "पूना
पैक्ट पर हस्ताक्षर करके मैंने अपने जीवन
की सबसे बड़ी गलती
की है....
मैं ऐसा करने को विवश था....
मेरे बच्चों....
मेरी इस भूल को सुधार लेना...
बाबा साहेब ने अपने जीवन में कभी मिस्टर
गांधी को महात्मा नहीं माना वे ज्योतिबा फुले
जी को सच्चा महात्मा मानते है.... और
जगजीवन राम को गद्दार .....
*** मित्रो यह है पूना पेक्ट का असली सच ***
जय भीम **** जय प्रबुद्ध भारत ***
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Thursday, June 11, 2015

आज १८ मार्च, आज के दिन बाबा साहब डॉ. आम्बेडकरने वह प्रसिद्ध ऐतिहासीस भाषण आग्रा के रामलीला मैदानसे किया था ।क्या कहा था बाबा साहबने……………

“इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है”

= बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर,



समाज के जिम्मेदार लोगों से बाबा साहब की एक अपील !!!

बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण !!

आगरा, 18 मार्च 1956

जन समूह से -

पिछले तीस वर्षों से तुम लोगों को राजनैतिक अधिकार के लिये मै संघर्ष कर रहा हूँ। मैने तुम्हें संसद और राज्यों की विधान सभाओं में सीटों का आरक्षण दिलवाया। मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिये उचित प्रावधान करवाये। आज, हम प्रगित कर सकते है। अब यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि शैक्षणिक,आथिर्क और सामाजिक गैर बराबरी को दूर करने हेतु एक जुट होकर इस संघर्ष को जारी रखें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिये तैयार रहना होगा,यहाँ तक कि खून बहाने के लिये भी।

नेताओ से-

यदि कोई तुम्हें अपने महल में बुलाता है तो स्वेच्छा से जाओ। लेकिन अपनी झौपड़ी में आग लगाकर नहीं। यदि वह राजा किसी दिन आपसे झगड़ता है और आपको अपने महल से बाहर धकेल देता है, उस समय तुम कहां जाओगे? यदि तुम अपने आपको बेचना चाहते हो तो बेचो, लेकिन किसी भी हालत में अपने संगठन को बर्वाद होने की कीमत पर नहीं। मुझे दूसरों से कोई खतरा नहीं है, लेकिन मै अपने लोगों से ही खतरा महसूस कर रहा हूँ।

भूमिहीन मजदूरों से -

मै गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिये काफी चिंतित हूँ। मै उनके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ। मै उनकी दुख तकलीफों को नजरन्दाज नहीं कर पा रहा हूँ। उनकी तबाहियों का मुख्य कारण उनका भूमिहीन होना है। इसलिए वे अत्याचार और अपमान के शिकार होते रहते हैं और वे अपना उत्थान नहीं कर पाते। मै इसके लिये संघर्ष करूंगा। यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पन्न करती है तो मै इन लोगों का नेतृत्व करूंगा और इनकी वैधानिक लड़ाई लडूँगा। लेकिन किसी भी हालात में भूमिहीन लोगों को जमीन दिलवाले का प्रयास करूंगा।

अपने समर्थकों से-

बहुत जल्दी ही मै तथागत बुद्ध के धर्म को अंगीकार कर लूंगा। यह प्रगतिवादी धर्म है। यह समानता, स्वतंत्रता एवं वंधुत्व पर आधारित है। मै इस धर्म को बहुत सालों के प्रयासों के बाद खोज पाया हूँ। अब मै जल्दी ही बुद्धिस्ट बन जाऊंगा। तब एक अछूत के रूप में मै आपके बीच नहीं रह पाऊँगा,लेकिन एक सच्चे बुद्धिस्ट के रूप में तुम लोगों के कल्याण के लिये संघर्ष जारी रखूंगा। मै तुम्हें अपने साथ बुद्धिस्ट बनने के लिये नहीं कहूंगा, क्योंकि मै आपको अंधभक्त नहीं बनाना चाहता परुन्त जिन्हें इस महान धर्म की शरण में आने की तमत्रा है वे बौद्ध धर्म अंगीकार कर सकते है, जिससे वे इस धर्म में द्रण विशवास के साथ रहें और बौद्धाचरण का अनुसरण करें।

बौद्ध भिक्षुओं से-

बौद्ध धम्म महान धर्म है। इस धर्म संस्थापक तथागत बुद्ध ने इस धर्म का प्रसार किया और अपनी अच्छाईयों के कारण यह धर्म भारत में दूर-दूर तक गली-कूचों में पहुंच सका। लेकिन महान उत्कर्ष पर पहुंचने के बाद यह धर्म 1213 ई. में भारत से विलुप्त हो गया जिसके कई कारण हो सकते हैं। एक प्रमुख कारण यह भी है की बौद्ध भिक्षु विलासतापूर्ण एवं आरामतलब जिदंगी जीने के आदी हो गय थे। धर्म प्रचार हेतु स्थान-स्थान पर जाने की बजाय उन्होंने विहारों में आराम करना शुरू कर दिया तथा रजबाड़ो की प्रशंसा में पुस्तकें लिखना शुरू कर दिया। अब इस धर्म की पुनरस्थापना हेतु उन्हें कड़ी मेहनत करनी पडेगी। उन्हें दरवाजे-दरवाजे जाना पडेगा। मुझे समाज में एसे बहुत कम भिक्षु दिखाई देते हैं,इसलिये जन साधारण में से अच्छे लोगों को भी इस धर्म प्रसार हेतु आगे आना चाहिये और इनके संस्कारों को ग्रहण करना चाहिये।

शासकीय कर्मचारियों से -

हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये हैं परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे,किन्तु मै देख रहा हूँ कि छोटे और बडे क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपनी तौदें (पेट) भरने में व्यस्त हैं। मेरा आग्रह है कि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं,उनका कर्तव्य है कि वे अपने वेतन का 20वां भाग (5%)स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु दें। तभी समग्र समाज प्रगति कर सकेगा अन्यथा केवल चन्द लोगों का ही सुधार होता रहेगा। कोई बालक जब गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो संपूर्ण समाज की आशायें उस पर टिक जाती हैं। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता समाज के लिये वरदान साबित हो सकता है।

छात्रों एवं युवाओं से-

मेरी छात्रों से अपील है की शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी प्रकार कि क्लर्की करने के बजाय उसे अपने गांव की अथवा आस-पास के लोगों की सेवा करना चाहिये। जिससे अज्ञानता से उत्पत्र शोषण एवं अन्याय को रोका जा सके। आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है।

"आज मेरी स्थिति एक बड़े खंभे की तरह है, जो विशाल टेंटों को संभाल रही है। मै उस समय के लिये चिंतित हूँ कि जब यह खंभा अपनी जगह पर नहीं रहेगा। मेरा स्वास्थ ठीक नहीं रहता है। मै नहीं जानता, कि मै कब आप लोगों के बीच से चला जाऊँ। मै किसी एक ऐसे नवयुवक को नहीं ढूंढ पा रहा हूँ, जो इन करोड़ों असहाय और निराश लोगों के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी ले सके। यदि कोई नौजवान इस जिम्मेदारी को लेने के लिये आगे आता है, तो मै चैन से मर सकूंगा।"

(संदर्भ- सलेक्टेड स्पीच आफँ डाँ अम्बेडकर - लेखक डी.सी. अहीर पृष्ठ क्रमांक 110 से 11 तक के भाषण का हिन्दी अनुवाद)

बुद्धिजीवी साथियों से विनम्र निवेदन है कि इस ऐतिहासिक भाषण की प्रतियाँ छपवाकर समाज में वितरित करें, यह एक सामाजिक जागृति का महान दयित्व है।

(समाज हित में जारी)
(आर.पी.एस.हरित. बामसेफ )
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