BY ......>>> Dbrambedkar Yvsamitifzd ---> -- अछूतों की ‘शिक्षा’ के लिए ‘बाबा साहब अम्बेडकर जी’ के अथक प्रयास ! ---
‘ब्रिटिंश’ राज में मैं ‘एक्जीक्यूटिव कौंसिलर’ था ! उस समय भारत के वायसाराय ‘लार्ड लिनलिथगो’ थे ! उनसे मैंने(Baba Saheb Ambedkar ji ne) एक दिन कहा कि, आप मुसलमानों के नाम पर, ‘अलीगढ़ विश्वविधालय’ को तीन लाख रुपये और हिंदुओं के नाम पर, ‘बनारस विश्व विधालय’ को तीन लाख रुपये देते हो, परंतु हम न तो ‘हिंदू’ हैं और न ही ‘मुसलमान’ ! अगर हमारे लिए भी आप कुछ करना चांहे तो, इससे भी कई गुना खर्च करना पड़ेगा ! अगर आप इतना न कर सकें तो, मुसलमानों के लिए जितना आप करते हैं उतना ही हमारे लिए भी करें ! इस संबध में ‘लिनलिथगो’ ने मुझ से कहा कि, मुझे जो कुछ भी कहना है , उसे एक पत्र में लिख कर दूँ ! उन के कथानुसार मैंने एक माँग पत्र उनको दे दिया !
एक बार मैं ‘लार्ड लिनलिथगों’ के पास फिर गया, और मैंने उनसे खुले दिल से ‘शिक्षा’ संबधी खर्चे पर बातें की । उनसे मैंने कहा कि, यदि आपको गुस्सा न आये तो एक प्रश्न पूँछना चांहता हूँ ।
उन्होंने कहा हाँ, ……. पूँछिए !
मैंने पूंछा कि, ….. “क्या यह सच नही है कि, ‘मैं’ अकेला ‘500 ग्रेज्ययेट्स’ के बराबर हूँ ?“
उन्होंने कहा, … ‘‘ हाँ मैं मानता हूँ !”
फिर मैंने उनसे पूंछा कि, …… “ इसका क्या कारण है ?”
इस पर उन्होंने कहा कि, …… “ उन्हैं मालूम नही है !”
तब मैंने उनसे कहा कि, ….. अपनी मेहनत से प्राप्त की गई मेरी ‘विद्धता’ इतनी है कि मैं इस विद्धता के बल पर ‘शासन’ के किसी भी ‘पद’ पर बैठ सकता हूँ ।
मुझे ऐसे ही विद्धान चाहिए, जिस प्रकार किले में निशाने पर बैठ कर ‘योद्धा सैनिक’, शत्रु को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार मेरी समझ के अनुरुप ऐसे ‘विद्धान’ व्यक्ति जो ‘शासन’ के पदों पर बैठ कर, मेरे ‘गरीब’ और ‘निरीह’ भाइयों की अच्छी तरह देख-रेख कर सकें । अगर आपको हमारे लोगों की भलाई ही करनी है तो, ऐसे ही लोगों को पैधा करना होगा । तभी इन ‘अछूतों’ की ‘भलाई’ हो सकेगी । केवल ‘क्लर्कों’ के ‘पद’ पर बैठ कर कुछ नही होने वाला ?
उन्होंने कहा हाँ, ……. पूँछिए !
मैंने पूंछा कि, ….. “क्या यह सच नही है कि, ‘मैं’ अकेला ‘500 ग्रेज्ययेट्स’ के बराबर हूँ ?“
उन्होंने कहा, … ‘‘ हाँ मैं मानता हूँ !”
फिर मैंने उनसे पूंछा कि, …… “ इसका क्या कारण है ?”
इस पर उन्होंने कहा कि, …… “ उन्हैं मालूम नही है !”
तब मैंने उनसे कहा कि, ….. अपनी मेहनत से प्राप्त की गई मेरी ‘विद्धता’ इतनी है कि मैं इस विद्धता के बल पर ‘शासन’ के किसी भी ‘पद’ पर बैठ सकता हूँ ।
मुझे ऐसे ही विद्धान चाहिए, जिस प्रकार किले में निशाने पर बैठ कर ‘योद्धा सैनिक’, शत्रु को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार मेरी समझ के अनुरुप ऐसे ‘विद्धान’ व्यक्ति जो ‘शासन’ के पदों पर बैठ कर, मेरे ‘गरीब’ और ‘निरीह’ भाइयों की अच्छी तरह देख-रेख कर सकें । अगर आपको हमारे लोगों की भलाई ही करनी है तो, ऐसे ही लोगों को पैधा करना होगा । तभी इन ‘अछूतों’ की ‘भलाई’ हो सकेगी । केवल ‘क्लर्कों’ के ‘पद’ पर बैठ कर कुछ नही होने वाला ?
मेरे इस कथन को ‘लार्ड लिनलिथगों’ ने ‘माना’ , और उसी बर्ष ‘26 विधार्थियों’ को ‘उच्च शिक्षा’ के लिए ‘विलायत’ भिजवा दिया //